मध्यकालीन संत गुरु जाम्भोजी का पर्यावरणीय चिंतन - ऐतिहासिक बलिदान गाथा।

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विश्नोई समुदाय ने एक ऐतिहासिक बलिदान 1730 में दिया था. जिसमें जोधपुर के खेजडली गाँव में 363 महिला-पुरुष व बच्चों ने ??

मध्यकालीन भारत में कई ऐसे संतों ने जन्म लिया जिन्होंने भक्ति, तप-साधना, आत्मबोध के साथ ही तत्कालीन समाज में फैली बुराइयों को जड़ से समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किये. इन संतों ने अपने चिंतन-मनन के माध्यम से जनता का भरपूर आदर प्राप्त किया है. आम जनमानस में इनके प्रति दृढ़ निष्ठा ने सहस्रों साधारण स्तर के नर-नारियों को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है. इनके जीवन-वृत्त से प्रेरित होकर इनके अनुयायी बिना किसी छुआछुत, ऊँच-नीच, भेदभाव के एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और जातीय व धार्मिक एकसूत्रता का अनुभव कर साम्प्रदायिक सौहार्द व समानता की मिसाल कायम करते हैं. इस प्रकार के संतों का सबसे बड़ा महत्व यह है कि अधिकांश जनता ने बिना धर्म सम्बन्धी दर्शन के शास्त्रार्थ में पड़े एकता, ध्यान, व्यवहारिकता और नैतिक जीवन के तत्त्वों को समझने में सफलता प्राप्त की । 

मध्यकालीन संत परम्परा के प्रसिद्द संतों कबीर, रैदास, तुलसीदास के साथ ही राजस्थान में ऐसे ही एक प्रसिद्द संत ने जन्म लिया, जिसने मरुधरा को बदलने के साथ ही मानवीय व्यवहार को पर्यावरणीय बनाने के लिए कार्य किया. राजस्थान के छोटे से कस्बे नागौर में जाम्भोजी नामक एक व्यक्ति का जन्म हुआ, जो आगे चलकर अपने सद्कार्यों व वचनों से प्रसिद्द होकर लोगों के बीच गुरु जम्भेश्वर या गुरु जाम्भोजी के नाम से प्रसिद्द हुए. इन्होने अपने तत्कालीन समाज की समस्याओं को लेकर चिन्तन-मनन तो किया, साथ ही उनके समाधान का रास्ता भी प्रदान किया. तत्कालीन समाज में प्रकृति व समाज के बढ़ते असंतुलन को बनाये रखने के लिए 29 नियमों का प्रतिपादन किया. इन नियमों को मानने वालों लोगों का एक समुदाय बना जो वर्तमान में विश्नोई समुदाय के नाम से प्रसिद्द है. इस समुदाय ने प्रकृति संरक्षण के लिए कई बार अपनी जान-न्यौछावर की है.

संत जाम्भोजी ने अपने बाल्यकाल से ही कई असंभव कार्यों को संभव करके दिखाए जो किसी चमत्कारिक घटना से कम नहीं लगते थे. इन्होंने बहुत कम उम्र में सामाजिक बुराइयों, जाति-प्रथा, ऊँच-नीच को छोड़कर पर्यावरण के प्रति चिंता व्यक्त की. जब संत जाम्भोजी अपने यौवन काल में थे, तो उस समय (1484-85) राजस्थान में एक भयंकर दुर्भिक्ष(अकाल) पड़ा. इस वजह से लोग भूखे मरने लगे और जंगली-जानवरों को मारकर खाने लगे तथा वे अपने क्षेत्र को छोड़कर जाने लगे. इससे संत जाम्भोजी चिंतित होने लगे. इस चिंताजनक हालात में जाम्भोजी ने गाँव छोड़कर जाने वाले लोगों से कहा कि आप लोग गाँव छोड़कर अन्यत्र नहीं जावें एवं पशुओ का मारकर न खावें. आप सबके भोजन की व्यवस्था मैं करूंगा. जाम्भोजी ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर अन्य जगहों से उनके भोजन की व्यवस्था की, जिससे उनका पलायन रुकने के साथ जंगली जानवरों को मारकर खाने में बहुत हद तक काबू पा लिया गया. संत जाम्भोजी इस घटना के बाद और भी ज्यादा चिंतित हो उठे तथा इस तरह के अकाल की मुसीबतों से बचने के लिए स्थाई समाधान पर चिंतन-मनन करने लगे. इसके बाद ही जाम्भोजी ने 29 नियमों का प्रतिपादन किया. ये नियम मुख्यतः (1) आचार सम्बन्धी, (2) धर्म सम्बन्धी, (3) शारीरिक सम्बन्धी, (4) स्वास्थ्य सम्बन्धी, (5) महिला सम्बन्धी, (6) पर्यावरण एवं प्रकृति-संरक्षण सम्बन्धी. इन्हीं उन्नतीस नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति विश्नोई कहलाया, जो आगे चलकर एक समुदाय के रूप में सामने आया. विश्नोई का तात्पर्य 20+9 = 29 (बीस+नौ = विश्नोई) है. 

विश्नोई समुदाय ने एक ऐतिहासिक बलिदान 1730 में दिया था. जिसमें जोधपुर के खेजडली गाँव में 363 महिला-पुरुष व बच्चों ने पेड़ो को बचाने के लिए अपनी जान दे दी. आज 500 सालों के उपरान्त भी यह समुदाय प्रकृति संरक्षण के लिए अपनी प्राण न्योंछावर कर रहा है. हिरन के बच्चे को दूध पिलाने की घटना 10 मई 1978 की है. चिंकारा प्रकरण 02 अक्टूबर 1998 का है, जिसमें सलमान खान पर मुकदमा दर्ज किया तथा 05 अप्रेल 2018 को पांच साल की सजा सुनाई गई.

वर्तमान में बढ़ते पर्यावरणीय खतरे एवं प्राकृतिक असंतुलन के समय में गुरु जाम्भोजी एवं विश्नोई समुदाय की प्रासंगिकता और भी ज्यादा बढ़ जाती है. 

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